श्री अरबिंदो घोष जीवनी -Biography of Aurobindo Ghosh in Hindi

श्री अरबिंदो घोष की जीवनी –Biography of Aurobindo Ghosh in Hindi एक महान भारतीय दार्शनिक व क्रांतिकारी ( महर्षि अरविन्द घोष )

Aurobindo Ghosh-बचपन एवं जीवन परिचय


भारत के महापुरुषों में श्री अरबिंदों Aurobindo Ghosh का विशेष स्थान है, इनका जन्म 15 अगस्त,1872 को कोलकाता में हुआ था। पिता का नाम श्री कृष्ण धान और माता का नाम श्रीमती स्वर्णलता देवी था।

पिता डॉ. कृष्ण धान सिविल मेडिकल ऑफिसर थे।उनकी माँ ऋति राजनारायण बोस की बड़ी बेटी थी। जो भारतीय संस्कृति एवं प्राचीन सभ्यता के पक्षधर थे। डॉ. कृष्ण धान चाहते थे कि उनके बच्चों का पालनपोषण पूरी तरह से यूरोपियन वातावरण में हो।

अत: अरबिंदों बचपन से ही अंग्रेजीऔर हिन्दुस्तानी बोलने में माहिर थे। उन्होंने अपनी मातृभाषा अपनी माता से सीखी थी। सन् 1879 में डॉ. कृष्ण धान धोष अपने तीनों बेटों के साथ इंग्लैण्ड चले गए,वहाँ उन्हें मेनचेस्टर में रेव विलियम एच. ड्रीवेट के यहाँ शिक्षा प्राप्त करने हेतु छोड़दिया।


प्रारंभिक शिक्षा-Aurobindo Ghosh की


अरबिंदों को बचपन में शिक्षा के लिए मिस्टर ड्रीवेट के घर छोड़ा गया। मिस्टर ड्रीवेट एक लैटिन विद्धान थे। उन्होंने अरबिंदों को अंग्रेजी और लैटिन की पढ़ाई करवाई तथा इतिहास, भूगोल, बीजगणित और फैंच पढ़ाया।

उनको बाईबल, शेम्सपियर शैली और कीट्स को पढ़ने में बहुत रुचि थी। उन्होंने बहुत सी कविताएँ पढ़ी ओर फाम्स फैमिली पत्रिका के लिए इतनी कम उम्र में ही कई कविताएँ भी लिखी अरबिंदों का सेंट पॉल और कैंब्रिज में पंजीकरण कराया गया।

अरबिंदों अपना अधिकतर समय अंग्रेजी कविताएँ, साहित्य काल्पनिक कहानियाँ फेंच साहित्य और प्राचीन मध्यकालीन और आधनिक यूरोप के इतिहास जस विषयों को पढ़ने में बिताते थे। उन्होंने अपना समय इटली, जर्मन और स्पेनिश भाषाओं के अध्ययन में भी लगाया।

Aurobindo Ghosh in School


अरबिंदों को लंदन में अपनी स्कूली पढ़ाई के दौरान कई समस्याओं का सामना करना पड़ा।
उनके पिता उन्हें पैसा भेजने में असमर्थ हो गए। वे सुबह एक या दो मक्खन ब्रेड पर निर्भर
रहते थे। और शाम को एक ब्रेड रोल पर।

सन 1890 में अरबिंदों केम्ब्रिज से किंग्स कॉलेज चले गए। उन्होंने प्रथम श्रेणी तथा एक विशिष्टता के साथ क्लासिकल ट्रिपोज की परीक्षा पास की और एक वर्ष के अंदर ही ग्रीक और लैटिन कविताओं के लिए लगभग सभी पुरस्कार जीते।

सन् 1890 सभी परीक्षाओं को पास कर लिया। सन 1890 में न चाहते हुए भी श्री अरबिंदों नेभारतीय सिविल सेवा की सभी परीक्षाओं को पास कर लिया। भारत में विदेशी तानाशाह के विरुद्ध एक नाराजगी की भावना अरबिंदों के दिल में धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी।

भारतीय मजलिस के सदस्य के रूप में उन्होंने कई क्रन्तिकारी भाषण भी दिए। उसके बाद उन्होंने समाज के लिए सचिव की हैसियत से भी कार्य किया। उस समय लंदन में भारतीयों के एक छोटे क्रांतिकारी समूह का गठन किया गया इस समूह ने दादाभाई नौराजी के नेतृत्व में एक व्यापक क्रांति की।


जिस समय श्रीअरबिंदों को आई.सी.एस. के लिए अयोग्य घोषित किया गया, तब वे 21 वर्ष की
उम्र में वापस भारत आये | अरबिंदो 14 वर्ष तक इंग्लैण्ड में रहे, लेकिन वे उस देश के साथ जुड़े
नहीं थे

उन्होंने स्वयं कहा था कि दूसरे देश के रूप में वे जिस देश के साथ बौद्धिक और भावनात्मक
रूप से जुड़े थे। वह इंग्लैण्ड नहीं बल्कि फ्रांस था। सन् 1893 में अरबिंदों सुरक्षित भारत पहँच गए तथा समाज सेवा के कार्य में जी जान से जुट गये।


Aurobindo Ghosh के बड़ौदा में क्रांतिकारी कार्य


अरबिंदों 8 फरवरी, 1893 को बड़ौदा राज्य में सेवा के कार्य पर नौकरी में लगे उस समय
इनका प्रमुख कार्य महाराजा के व्यक्तिगत कार्यों के लिए उत्तरदायी थे, जैसे महत्त्वपूर्ण पत्रों को
लिखना, सभी पत्रों और दूसरे संबंधित दस्तावेजों को व्यवस्थित रूप में लगाना और सहमति पत्र
तैयार करना इत्यादि।

अरबिंदों ने कुछ समय तक महाराजा के व्यक्तिगत सचिव के रूप में भी कार्य किया। अगस्त 1893 में, उन्होंने पूना की एक साप्ताहिक इंदू श्रृंखला के लिए लेखों की कई श्रंखलाएँ लिखी। इस श्रृंखला को न्यू लेम्पस फॉट ओल्ड के नाम से जाना जाता था। राष्ट्रवादीआन्दोलन पर उनके ये पहले सार्वजनिक लेख थे।


सन् 1895 में अरबिंदों की कविताओं का एक संग्रह “सांग्स टू मयटटिला ऐंड अदर पोएम्स् के नाम
से प्रकाशित हआ। इनमें से कुछ कविताएँ श्री अरबिंदों के यूरोपियन संस्कृति और वहाँ के वातावरण
के प्रभाव को दर्शाती हैं। और कुछ उनके भारत और भारतीय संस्कृति के प्रति प्रथम प्रतिक्रिया का
चित्रण करती है। इनमें दो कतियाँ उर्वशी और लव एण्ड डेथ बड़ौदा में ही लिखी गई थी।

1900 ई. में अरबिंदों का बडौदा महाविद्यालय में अंग्रेजी के प्राध्यापक के रूप में स्थानांतरण हो गया और 1901 में उनका विवाह श्री भूपालचन्द बोस की पुत्री मृणालिनी से हुआ उसके थोड़े दिन बाद अरबिदों बड़ौदा पहँचे उस समय उनको क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए तैयार करने का मौका मिला।


श्री अरबिंदों के लिए भारत की आजादी ,धरती पर स्वर्ग की स्थापना करने जैसा था उस समय श्री
अरबिंदों राजनीतिक गतिविधियों के प्रमुख केन्द्र थे बंगाल ,गुजरात और महाराष्ट्र अरबिंदों
की एक कृति जो गुप्त तरीके से प्रकाशित हुई उसे नो काम्प्रोमाइज के नाम से जाना जाता है।

श्री अरबिंदो एक उत्सुक पाठक थे। उन्होंने मुंबई में पुस्तक विक्रेताओं का एक आदेश दे रखा था कि जो भी नई पुस्तक उनके पास आए वे उन्हें उन पुस्तकों की एक सूची भेज दें।

वे अपनी पुस्तकों के खर्च हेतु अपनी महावार का एक भाग अलग से निकाल कर रख देते थे।


बंगाल में राष्ट्रवादी कार्यक्रम-Aurobindo Ghosh Freedom Movement in Bengal


सन् 1905 में बंगाल का विभाजन ने एक ऐसी स्थिति को जन्म दिया जो अरबिंदों की नज़र में एक वरदान से कम नहीं था। उन्होंने उस स्थिति में स्वयं को राष्ट्र की आजादी के खातिर व्यस्त कर लिया था।

श्री अरबिंदो बिपिन चंद्रपाल और बी.सी, चटर्जी के नेतृत्व में इस घोषणा के विरोध में एक जूलूस निकाला गया। मार्च 1906 में एक साप्तहिक बंगाली अखबार जो युगांतर के नाम से जाना जाता था श्री अरबिंदों ने स्वयं इसके कुछ लेख लिखे।


श्री अरबिंदों सभी राजनीतिज्ञों में से पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने भारत में होने वाली समूची
राजनीतिक क्रियाकलापों के उद्देश्य के रूप में पूर्ण स्वराज की खुले रूप से वकालत की।
उन्होंने देश की वस्तुओं के इस्तेमाल विदेशी वस्तुओं का विरोध सत्याग्रह असहयोग राष्ट्रीय
शिक्षा व दूसरों कई मामलों का जिक्र करते हुए कई लेख लिखे। देश ने इन कार्यक्रमों का
बड़ी कड़ाई से पालन किया।


अगस्त 1906 में श्री अरबिंदों कोलकाता के नेशनल कॉलेज में इसके प्रथम प्रधानाचार्य के
रूप में नियुक्त हए। 24 जुलाई, 1907 को श्री अरबिंदों और विपिन चंद्रपॉल के विरुद्ध एक
भड़काऊ लेख प्रकाशित करने के आरोप में अभियोग चलाया गया।

ऐसा विश्वास किया जाता है कि जब उन पर अभियोग चलाया गया था, उस समय रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपनी
मशहूर कविता होमेज टू श्री अरविंदों लिखी। नवम्बर 1907 में श्री अरबिंदों ने बंगाल प्रोविंसियल कॉन्फ्रेन्स के मिदनापुर सत्र में नेशनलिस्ट पार्टी का नेतृत्व किया।


श्री अरबिंदों की गिरफ्तारी


श्री अरबिंदों की उत्तरी कोलकाता में एक गार्डन के पास कुछ पारिवारिक जमीन थी। यह जमीन
बेटिन के द्वारा वहाँ क्रांतिकारियों के लिए केन्द्र स्थापित करके उपयोग में लाई गई। जहाँ उन्होंने
क्रांतिकारी साहित्य और गीता का अध्ययन किया।


उन्होंने वहाँ साधना का भी अभ्यास किया और बम बनाने के कई प्रयोग किये। 3 मई 1908 की
सुबह जल्दी ही पुलिस ने अरबिंदों के घर पर छापा मारा उन्हें गिरफ्तार कर लिया। घर की पूरी
तलाशी ली गई और उनके व्यक्तिगत सामानों को भी जब्त कर लिया गया। उन्हें लाल बाजार के
पुलिस स्टेशन ले गये और वहाँ से अलीपर जेल भेज दिया गया। 5 मई, 1908 को उनके कैदी
जीवन की शुरुआत हई तथा 1920 में उन्हें रिहा कर दिया गया।


प्रमुख मिशन योग


जेल में रहते हुए भी अरबिंदों ने योग पर विशेष कार्य करने की सोची जो कि उन्हाने बडौदा में प्रारंभ
किया था। उनके जीवन का यह परम लक्ष्य बन चुका था, उनका योग जिसे वे इंटेगटल योगा कहते थे, के तीन आधारभुत तरीके थे जिनका संबंध लालसा, आत्म , सर्मपण तथा अस्वीकरण से था।

1904 मेंउन्होंने प्राणायाम का अभ्यास करना आरंभ किया था। वे अपने सिर के चारों और एक विद्युतीय शक्ति का आभास करते थे। उनकी लिखने की शक्ति जो पूरी तरह से समाप्त हो चुकी थी पूरी शक्ति के साथ फिर से जीवित हो उठी। जिस प्रवाह के साथ वे प्रारंभ में लिख पाते थे वह उन्हें फिर से प्राप्त हो गई। उसके बाद वह कभी समाप्त नहीं हुई। योग के अभ्यास से उनके स्वास्थ्य में भी बहुत सुधार हुआ। वे शक्तिशाली हो गए और उनकी त्वचा में भी एक अलग निखार आ गया।


अलौकिक ज्ञान की प्राप्ति-Yoga and Aurobindo Ghosh


श्री अरबिंदों की साधना और योग बिना किसी रुकावट के चलती रही। सन् 1926 के शुरुआत से ही
अरबिंदों के शिष्यों ने एक उच्चतम शक्ति का दबाव महसुस किया और वे मार्गदर्शन के लिए द मदर के पास आने लगे।

सन् 1926, नवंबर के बाद श्री अरबिंदों ने अपने शिष्यों और मिलने वालों के साथ सभी व्यक्तिगत सम्पर्क समाप्त कर एकांत में चले गए। उसके बाद ‘द मदर’ ने आश्रय का सारा कार्यभार संभाल लिया। अपने अवकाश के बाद श्री अरबिंदों Aurobindo Ghosh वर्ष में तीन बार श्रोताओं को दर्शन देते थे।’


महान आत्मा का निधन


भारत के महान पुरुष श्री अरबिंदों ने 5 दिसंबर, 1950 को अपना शरीर त्याग दिया 111
घंटों तक उनका शरीर चमकता रहा जब इस प्रकाश ने उनके शरीर का साथ छोड़ दिया।
तब उनका दाह संस्कार किया गया। आश्रम में उनकी समाधि भी बनाई गई। अरबिंदों
अपने शिष्यों से कहते थे कि जो भी कार्य किया जाना चाहिए वह सेवा की भावना और बिना
किसी स्वार्थ के किया जाना चाहिए और यह भगवान को समर्पित होना चाहिए।


सन् 1960 में ‘द मदर’ ने अरबिंदों सोसायटी(Aurobindo Ghosh Socity) को एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन का रूप दे दिया।
‘द मदर इसकी संस्थापक थी और उन्होंने सोसायटी के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया।
इस संगठन का उद्देश्य श्री अरबिंदों ओर दमदार’ के संदेशों को बनाए रखना तथा धरती पर एक नए
और बेहतर जीवन के लिए इसको सारे संसार तक पहुँचाना था।

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