बाबा रामदेव की कहानी |Story About Baba Ramdev

यह छोटी कहानी योगगुरु Baba Ramdev की बिलकुल भी नहीं है यह कहानी रामदेव जी की है जो आजसे लगभग 500 वर्ष पूर्व के महान संत की कहानी है |

Story About Baba Ramdev

पन्द्रहवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में भारत में अराजकता की स्थिति बनी हुई थी। हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य तो चरम सीमा पर था ही, साथ ही समाज में लूट-खसोट का भंयकर वातावरण था।

हिन्दू समाज में छुआछूत की भावना चरमोत्कर्ष पर थी। पश्चिमी राजस्थान की मरुभूमि में स्थिति और भी गंभीर थी। यहाँ एक और लूट-खसोट, वैर-विरोध तथा छुआछूत व्याप्त था तो दूसरी ओर भैरव राक्षस का भंयकर आतंक था।

ऐसे विकट समय में मरुधरा में पोकरण नामक ऐतिहासिक नगर के पास रूणीचा में वि.सं. 1409 की चैत्र शुक्ला पंचमी के दिन बाबा रामदेव अवतरित हुए।

बाबा रामदेव(Baba Ramdev) के पिता का नाम अजमल था और माता का नाम मैणादे था। ये जाति के तुंवर या तंवर वंशीय राजपूत थे जो वस्तुतः तोमर वंश से भिन्न नहीं है। कुंती पुत्र अर्जुन पाण्डव की 31वीं पीढ़ी में तुंग राजा हुए। इन्हीं से तोमर वंश का प्रवर्तन हुआ। तुंग की 33वीं पीढ़ी में अनंगपाल और अनंगपाल की आठवीं पीढ़ी में बाबा रामदेव प्रकट हुए।

बाबा रामदेव के आन्दोलन व विवाह


बाबा रामदेव ने लोक में व्याप्त अत्याचार का अन्त किया, वैर-विद्वेष को समाप्त किया, अछूतोद्वार का सफल आन्दोलन चलाया और जनता को भैरव राक्षस के आतंक से मुक्ति दिलाई।


बाबा रामदेव(Baba Ramdev) ने अमरकोट के सोढ़ा दलजी की पुत्री नेतलदे से विवाह किया जो विवाह से पूर्व पंगु थी। रामदेव के स्पर्श मात्र से स्वस्थ हो गई। रामदेवजी की बड़ी बहन का नाम सुगणा था तथा बड़े भाई का नाम वीरमदेव था।
लोक मान्यतानुसार रामदेव का जन्म भादवा के शुक्ल पक्ष की द्वितीया मानी जाती है। उनके जन्म के विषय में भी यह धारणा है कि उन्होंने माता की कोख से जन्म न लेकर बड़े भाई वीरमदेव के पालने में ही प्रकट हुए थे।

स्तनपान कराते समय उफनते रोक कर अपनी माता को उन्होंने शिशु अवस्था में ही चमत्कार बता दिया था।
बाबा रामदेव (Baba Ramdev)के चमत्कारों को ‘पर्चा‘ नाम दिया गया है। रामदेवजी ने अनेकानेक पर्चे दिये। रामदेवजी बालक रामदेवजी के सिर पर हाथ रख दिया था। रामदेवजी अपने जीवनकाल में ही लोक देवता के रूप में पूजे जाने लगे थे।

उनके पुनीत लोक कल्याणकारी कार्यों के फलस्वरूप बाबा रामदेव की मान्यता, आदर और उनके प्रति भक्ति भाव उत्तरोत्तर अधिकाधिक वृद्धि पाता जा रहा है।

हर जाति के लोगों के घरों में थान श्वेत रंग की ध्वजा (नेजा) और गाँव-गाँव में मंदिर या देवरा (चबूतरा) पाया जाता है।

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को रूणीचे में मेला भरता है। जहाँ दूर-दूर से लोग लाखों
की संख्या में लोग आते हैं। अनेक व्यक्ति पैदल आते हैं। कुछ व्यक्ति तो साष्टांग दण्डवत करते हुए कई दिनों में पहुंचते हैं।
बाबा रामदेव(Baba Ramdev) ने कई लौकिक कार्य करवाये जिनमें रामदेवरा ग्राम की स्थापना, पर्चा बावड़ी का निर्माण और राम सरोवर तालाब का निर्माण प्रसिद्ध हैं।

इनके अलौकिक कार्य तो अगणित हैं जिन्हें पर्चा कहा जाता है जैसे-उफनते दूध को रोक देना, दर्जी द्वारा बनाया कपड़े का घोड़ा वास्तविक घोड़े की भाँति चल पड़ना, भैरव राक्षस का वध, सारथिया खाती को पुनः जीवित कर देना, लखी बनजारा की मिश्री का नमक बना देना, पीरों के कटोरे हाथ पसार कर ला देना, सुगना बहन के पति पूंगलगढ़ के कंवर किशनसिंह पड़िहार द्वारा हेय (नीचा) समझने पर शक्ति का परिचय कराना, नेतलदे की पंगुता दूर करना, रानी नेतलदे की सखियों को बिल्ली को जीवित कर चमत्कार दिखाना, सुगनाबाई के बालक को पुनः जीवित कर देना, वीरमदेव जी गाय का बछड़ा जीवित कर देना। रानी नेतलदे को गर्भ में पुत्र ‘सांदा’ की बोली सुना देना आदि।

रामदेव के कार्य


जन कल्याण के इन महत्वपूर्ण कार्यों के साथ ही बाबा रामदेव ने मानव मूल्यों की स्थापना एवम् आत्म कल्याण का सन्देश देने वाले पदों की रचना की, जो कालजयी हैं। इस प्रकार अपने 33 वर्ष के अल्प जीवनकाल में ही बाबा रामदेव ने वह महान् कार्य किया, जो सैकड़वर्ग के लिए असंभव था ।

हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रतीक और महान अछूत उद्धारक बाबा रामदेव(Baba Ramdev) का व्यक्तित्व समस्त प्रकार की साम्प्रदायिक एकता का प्रत्यक्ष प्रमाण है

सभी प्रकार के भेदभावों को मिटाने तथा एकता स्थापित करने की पुनीत प्रेरणा से परिपूर्ण बाबा रामदेव हिन्दुओं के देव हैं तो मुस्लिम भाइयों के पीर ,वैष्णव भक्तों के पूज्य राम हैं तो संतो के लिए बाबा

इन सभी गुणों विशेषणों को अपने आप में समायोजित करने वाला सुन्दर और श्रेष्ठ नाम है-

‘बाबा रामसा पीर।
गुजरात और राजस्थान संतों, शूरवीरों और सतियों की धरती है। यहाँ इन
तीनों को समान आदर मिला है।(Baba Ramdev) बाबा रामसा पीर का स्वरूप संत और शूरवीर दोनों
में रहा। उनका व्यक्तित्व भक्ति एवम् शक्ति का संगम है, इसलिए उनके एक हाथ में
चमचमाता हुआ भाला है तो दूसरे हाथ में भक्ति का प्रतीक तन्दूरा है। लोकवाणी ने
उनको अपनी श्रद्धा से ‘पिछम धरा के बादशाह’, ‘हिन्दवाणी सूरज’, ‘लीले रा
असवार’, ‘धवली धजा रा धणी’, ‘पिछम धरा रा पीर’, ‘अलख धणी’ और ‘निकलंक
नेजाधारी’ इत्यादि कई विशेषणों से अलंकृत किया है।

बाबा रामदेव(Baba Ramdev) का व्यक्तित्व एक महान् युग पुरुष के रूप में अत्यन्त प्रेरणादायी और हर प्रकार से महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय एकता के प्रतीक वे दिव्य व्यक्तित्व के स्वामी और युगान्तकारी प्रभाव वाले अलौकिक युगपुरूष थे।
राजस्थान में रामदेवजी तंवर की पीरों में गणना की जाती है। वे यहाँ लोक-देवता के रूप में पूजे जाते हैं और उनकी यशोगाथा विस्तार के साथ गाई जातीहै।

राजस्थान में उनके नाम पर बहुत बड़ी संख्या में मंदिर बने हुए हैं, जिन्हें रामदेवरा
कहा जाता है। रामसापीर के भक्त रात्रि जागरण करते हैं, वह जम्मो कहलाता है।
इस अवसर पर रूपांदे एवं तोलादे की जीवन कथा भी गाई जाती है। साथ ही उनके
पद भी गाए जाते हैं। जन साधारण में भक्ति भावना जगाए रखने के लिए ये जागरण
बड़े उपयोगी हैं। उनमें Baba Ramdevएवं धारू मेघवाल के पद भी गाए जाते हैं। चौबीस
प्रमाणों के अतिरिक्त भी अनेक पद रामदेवजी के नाम से प्रचलित हैं। लोक साहित्य
की यही विशेषता है कि उसमें किसी के नाम से प्रचलित गीतों की संख्या बढ़ भी सकती
है और घट भी सकती है, शुद्ध रूप से किसी व्यक्ति विशेष की रचनाओं को छांटना
अति दुष्कर होता है
बाबा रामदेव(Baba Ramdev) ने भादो सुदी एकादशी वि .स. 1442 को रुनिचे में जीवित समाधी लेकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर दिया

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